जंगल में उगने लगी कंक्रीट, शहरों में रहने लगे जानवर, पढ़िए पर्यावरण तबाही की यह कविता…

 

 

रायपुर। कोरोना संक्रमण की तबाही ने लोगों को पर्यावरण का महत्त्व समझा दिया है आने वाले समय में फिर ऑक्सीजन के लिए लोगो को तड़पना न पड़े इसके लिए हमे अभी से पर्यावरण को बचने के लिए सामने आना होगा। पर्वावरण का स्वच्छ और सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है और किन कारण से इसकी दुर्गति हो रही है इसे रायपुर के प्रशांत मुंडेजा द्वारा रचित पर्यावरण की तबाही कविता से समझाया गया हैं।

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“तबाही पर्यावरण की “

अपना भी एक जंगल था शीशम के पेड़ों वाला,
जब से जंगल में उगने लगी है कंक्रीट ,तब से जानवर शहरों में रहने लगे हैं।

अब शीशम ,सागौन, महुआ और आम तथा अन्य जात की लकड़ियों की कटाई होने लगी, पर्यावरण नष्ट होने लगा है हरियाली वनों में सोने लगी।

गुलशन न रहा ,गुलंची न रहा, रह गई कहानी फूलों की, उदास करती थी विरानी आखरी निशानी फूलों की ।

पेड़, पौधे ,लताएं,बेले ,फूल, पान और फलों के दर्शन दुर्लभ,
इन दिनों सब गायब इस घनघोर वन में, वनोपज की चोरी चुभ जाती है हम सबके मन में ।

मन के सूने गांव में दिखी है उड़ती धूल, निकले सभी बबूल, मिले जो भी फूल ।

अभी भी वक्त है बचा लीजिए पृथ्वी व प्रकृति को ,जल संरक्षण और हरी भरी धरती की आकृति को।।।

रायपुर, प्रशांत मुंडेजा

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