विशेष : मिर्ची की खेती और आत्मनिर्भरता, पहाड़ी कोरवा समूह और बीएससी शिक्षित युवा की कहानी

फीचर स्टोरी । कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में खेती करना लाभकारी हो चुका है. राज्य सरकार ने बीते साढ़े तीन वर्षों में खेती को प्राथमिकता में रखकर विभिन्न योजनाओं को संचालित किया है और इसका सीधा असर आज जमीन पर दिखाई दे रहा है. परंपरागत खेती में कई बदलावओं के साथ अब राज्य के लोग आधुनिक रूप से और पूरी तरह व्यवसायिक तौर पर खेती कर रहे हैं. इससे खेती करने वाले किसानों को काफी फायदा हो रहा है.

मुख्यतः धान की खेती के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ अब सब्जी की खेती का भी गढ़ बनते जा रहा है. राज्य में सब्जी की खेती का फैलाव अब मैदानी इलाकों से निकलकर पहाड़ों तक हो चला है. खास तौर पर सब्जी की खेती के साथ विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के लोग भी जुड़ रहे हैं.

सब्जी की खेती वर्तमान बेहद मुनाफे की खेती हो गई है. यही नहीं सब्जी की खेती आज समूह के स्तर पर भी की जा रही है. इससे खेती में भार कम भी आ रहा है कम समय में समूह की खेती करना लाभकारी भी साबित हो रहा है.

सब्जी की खेती में बीते कुछ वर्षों में युवाओं की भागीदारी भी बढ़ी है. पढ़े-लिखे नौजवान भी सब्जी की खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं. प्रबंधन, तकनीकी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं का आकर्षण आज खेती की ओर बढ़ा है.

शायद इसके पीछे एक बड़ी वजह है राज्य में राज्य सरकार की प्राथमिकता में खेती का होना है. इसके साथ ही खेती को लेकर सरकार की ओर से दी जा रही विभिन्न छुट भी. सरकार की नरवा-गरवा, घुरवा-बारी(सुराजी) योजना के साथ गोधन न्याय योजना की भूमिका में इसमें सबसे अहम है.

विशेष बात यह है कि सब्जी की खेती करने वाले लोगों में अलग-अलग फसलों की खेती भी की जा रही है. जैसे टमाटर की खेती करने वाले किसान टमाटर की खेती को प्रमुखता से करते हैं. इसी तरह से मिर्ची की खेती भी अब राज्य में बड़े पैमाने पर हो रही है. मिर्ची की खेती करके भी किसान आत्मनिर्भर हो सकते हैं. इसकी बानगी आज राज्य के अलग-अलग हिस्सों में देखी जा सकती है.

इस रिपोर्ट में ऐसे ही दो हिस्सों की कहानी आपको बताने जा रहे हैं. यह कहानी पहाड़ी कोरवा समूह की ओर से की जा रही खेती और एक बीएससी शिक्षित युवक की है. जिन्होंने मिर्ची की खेती को व्यवसाय के रूप में चुना और आज शुरुआती दिनों में ही ठीक-ठाक व्यवसाय कर आमदनी प्राप्त कर ले रहे हैं.

बलरामपुर कोरवा जनजाति की महिलाओं ने संभाली कमान

यह तस्वीर बलरामपुर जिले में शंकरगढ़ जनपद के जगिमा पंचायत की है. यहाँ इसी तरह से महिला समूह बनाकर पहाड़ी कोरवा जनजाति की महिलाएं सब्जी की खेती कर रही हैं. महिला समूह का नाम कृष्णा महिला स्व-सहायता समूह है. समूह की महिलाओं ने मिर्ची की खेती का चुनाव किया है.

सरकार की ओर से संचालित नरवा-गरवा, घुरवा-बारी(सुराजी) योजना के अंतर्गत समूह ने बारी योजना के तहत सामुदायिक खेती में मिर्ची की खेती करना प्रारंभ किया.
समूह में कुल 10 सदस्य हैं. योजना के तहत समूह के सदस्यों को गौठान के निकट लगभग 1 एकड़ जमीन दिया गया. उद्यानिकी विभाग की ओर से समूह की महिलाओं को मिर्ची खेती का प्रशिक्षण दिया गया. लाइन विधि से मिर्ची की खेती महिलाओं की ओर से की गई. खेती से पूर्व महिलाओं को तकनीकी जानकारी समय-समय पर खरपतवार निकालना, रोगों की पहचान करना एवं समय पर जैविक पद्धति से उपचार करना बताया गया. इसके साथ ही समूह की महिलाओं को मंडी एवं स्थानीय बाजार उपलब्ध कराने में भी मदद प्रशासन की ओर दी गई.

जानकारी के मुताबिक अब तक समूह के सदस्यों द्वारा चार चरणों में मिर्ची की तोड़ाई की गई है, जिसमें प्रथम चरण में 90 किलो, द्वितीय चरण में 180 किलो, तृतीय चरण में 150 किलो, चौथे चरण में 180 किलो मिर्ची की तोड़ाई शामिल है. इस प्रकार चार चरणों में कुल 600 किलो मिर्च उत्पादित कर औसत 30 रूपये प्रति किलो की दर से मंडी एवं बाजार में बेचा गया है. यह फसल आगामी 2 माह तक समूह को लाभ दिलाएगा.
मिर्ची खेती में कुल 4 हजार रूपये की लागत लगाकर 14 हजार रूपये का शुद्ध लाभ अब तक समूह के सदस्यों को प्राप्त हुआ है. कोरवा जनजाति की महिलाओं के लिए एक अलग ही अनुभव रहा है. महिलाएं अब और भी ज्यादा पैमाने पर खेती करने के लिए आगे आ रही हैं.

सरकारी नौकरी की चाह छोड़ खेती से किया गठजोड़

पहाड़ी कोरवा समूह के बाद अब मिलिए बीएससी शिक्षित युवा से. नाम है कुरसो लाल. कोंडागांव जिले में बड़े कनेरा गांव के रहने वाले कुरसो लाल युवा किसान हैं. जीव विज्ञान विषय से बीएससी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुरसो भी अन्य युवाओं की तरह ही सरकारी नौकरी की चाह पाले हुए अपनी कोशिशें करते रहा. लेकिन बाद में उन्हें लगा कि बेहतर खेती की ओर बढ़ा जा जाए. खेती भी अब पहले की तुलना में काफी लाभकारी है.

कुसरो ने खेती में सब्जी की खेती को अपनाया. और उन्होंने मिर्ची की खेती करना प्रारंभ किया. कुसरो के मुताबिक उसके खेत के पास ही मार्कण्डेय नाला बहता है. नरवा योजना के तहत नाले का विकास किया गया. नरवा विकास कार्यक्रम के तहत जल संरक्षण के लिए नाले में ब्रश वुड चेक डेम, लूज बोल्डर चेक डेम, गेबियन संरचना, परकोलेशन टैंक का निर्माण किया गया है. इससे नाले में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी की व्यवस्था होती है. साल भर नाले से पानी मिलने की वजह है उन्नत रूप में मिर्ची की खेती कर पा रहे हैं.

कुसरो के अनुसार भरपूर पानी से मिर्ची की भरपूर पैदावारी भी हुई है. बीते 6 महीने में ही 4 लाख तक मिर्ची का उत्पादन उन्होंने किया है.

कर्ज माफी का भी मिला लाभ – कुसरो लाल अपने दो एकड़ खेत मे धान की फसल भी लेते हैं. पिछले साल धान बेचकर 65 हजार रुपये और बोनस भी मिला है. वे बताते हैं कि मुख्यमंत्री के वादे के अनुसार उनका 65 हजार का कर्जा भी माफ हुआ था.

रासायनिक छोड़ जैविक खाद -कुरसो लाल बताते हैं कि वे रासायनिक खाद का नहीं बल्कि घर में 16 गाय-भैंस हैं जिनके गोबर से वे ऑर्गेनिक खाद बनाते हैं और उसे ही खेत मे उपयोग करते हैं.

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