Exclusive: एक डॉ. अपनी किस्मत लिखता था हर शनिवार…जानें कैसे बने प्रदेश के मुखिया…

महेन्द्र कुमार साहू/रायपुर। एक प्रोडक्ट के विज्ञापन में यह लाईन आपने खूब सुनी है। टेढ़ा है पर मेरा है। राजनीति के रास्ते भी टेढ़े-मेढे सफर से होकर गुजरते हैं। आज हम आपको छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव के टेढ़े-मेढ़े सफर पर ले चलते हैं।

प्रदेश में 2003 का चुनाव कांग्रेस जहां अजीत जोगी के चेहरे पर लड़ रही थी। तो वहीं भारतीय जनता पार्टी दिलीप सिंह जूदेव के चेहरे पर लड़ रही थी। किसे पता था 2003 के चुनाव के नेता कहलाने वाले दिलीप सिंह जूदेव चाय में पड़ी मक्खी की तरह राजनीति से बाहर कर दिये जाएंगे।

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दिलीप सिंह जूदेव की छवि उस समय तेज तर्रार नेता के रूप में थी। जहां जाते लोग उनका स्वागत खून से तिलक लगाकर करते थे। उनका जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। तो वहीं तात्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी कांग्रेस की कमान संभाले हुए थे। अजीत जोगी के मजबूत नेतृत्व में कांग्रेस आगे बढ़ रहा था। तभी अचानक घनाक्रम में बड़ा परिवर्तन आया। कालचक्र ने अपना चक्रव्यू रचाया। किसे पता था।

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राजनीति के सरताज उनके रास्ते में गड्ढे खोद रहे हैं। मुछों में ताव देने वाले कुमार साहब को लोग चाय में पड़े मक्खी की तरह बाहर निकालने में लगे थे। ये वे समझ नहीं पाये। और षड़यंत्रों के जाल में फंसते चले गये। तब के पर्यावरण मंत्री दिलीप सिंह जूदेव का दिल्ली के पांच सितारा होटल में ऑस्ट्रेलिएआई फर्म से रिश्वत लेने का वीडियो जारी हुआ। इस वीडियो में कुमार साहब कहते दिख रहे थे। ‘पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं’ है। यह वीडियो देखते ही देखते पूरे देश में आग की तरह फैल गई है।

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इस मामले के गरमाने के बाद कुमार साहब ने एक बयान जारी करते हुए पद से इस्तीफा दे दिया। बयान में साफ-साफ लिखा था। जब तक आरोप से बरी नहीं हो जाता तब तक राजनीति में दोबारा कदम नहीं रखूंगा। और उन्होंने ऐसा ही किया। छत्तीसगढ़ी में एक हाना खूब प्रचलित है। सीका के टूटती अऊ बिलाई के झपटती…आगे ऐसा ही हुआ। प्रदेश की राजनीति से कुमार साहब ने जैसे ही किनारा किया। वैसे ही डॉ. शनिचर की बंद किस्मत खुल गई।

डॉ. शनिचर के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. रमन सिंह का प्रदेश की राजनीति में प्रवेश कराया गया। भाजपा ने डॉ. रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। जिसके बाद वे लगातार चाउर वाले बाबा से लेकर न जाने क्या-क्या उपमा हासिल करते चले गये। डॉ. रमन सिंह अपने कामों से जाने जा रहे थे। तो वहीं उनके दामन पर भ्रष्टाचार के दाग भी लगते जा रहे थे। शायद उनका मानना रहा होगा कि राजनीति में दाग अच्छे होते हैं। जो सर्फ एक्सल से कभी भी धूल जाएंगे। राजनीति में कुछ ऐसे भी लोग हुए जिन्होंने आरोप लगने मात्र से कुर्सी को ठोकर मार दी।

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कुर्सी का मोह है की छुटता नहीं… 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी स्वाति नक्षत्र की बूंद की तरह उम्मीद की टक… टकी..लगाए ताक में बैठे हैं कि फिर न जानें कब छत्तीसगढ़ी हाना सीका के टूटती अऊ बिलाई के झपटती…सही साबित हो जाये। वो तो भूपेश बघेल ही हैं जो अपने किसी भी प्रतिद्वंदी को अवसर ही नहीं देते।

और चारों खाने चित्त कर देते हैं। इस बीच राजनीतिक गलियारों से खबर आ रही है कि डॉ. रमन सिंह के चेहरे पर बीजेपी अब प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ने वाली। खबरों की मानें तो बीजेपी डॉ. रमन सिंह को अब छत्तीसगढ़ से खदेड़ना चाह रही है। वहीं सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में डॉ. रमन सिंह किसी राज्य के राज्यपाल बनाए जा सकते हैं। हालांकि यह तो वक्त ही बताएगा की कुर्सी का मोह छुटता या नहीं। या फिर डॉ. शनिचर किसी और अवसर को भुनाकर कुर्सी हासिल कर लेते हैं।

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